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डॉ. शोएब राही की अदबी खिदमात पर सेमिनार, प्रो. अहमद बद्र को सनद-ए-एज़ाज़

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शायर डॉ. शोएब राही की शायरी में कौमी एकजुटता और तरक्कीपसंद तहरीक की झलक : वक्ता

मेदिनीनगर (पलामू)। शायर और साहित्यकार डॉ. शोएब राही की अदबी खिदमात (साहित्यिक सेवाओं) पर मेदिनीनगर में एकदिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने उनकी शायरी, सामाजिक सरोकारों, मजदूरों के प्रति प्रतिबद्धता और कौमी यकजहती (सांप्रदायिक सद्भाव) के संदेश पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर जमशेदपुर स्थित करीम सिटी कॉलेज के उर्दू विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष प्रोफेसर अहमद बद्र को अदबी खिदमात के लिए सनद-ए-एज़ाज़ से सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का आगाज कलाम-ए-पाक की तिलावत से हुआ। मुजाहिदुल इस्लाम ने तिलावत पेश की। इसके बाद अदनान काशिफ ने अफसर सहसरामी की किताब गर्द-ए-कारवां में शामिल नात पेश की। राज अमन ने भी मदीने की शान में नात का पाठ किया।

इसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के फारसी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. हसन अब्बास की सदारत में सेमिनार शुरू हुआ। प्रारंभ में अफसर सहसरामी की पुस्तक गर्द-ए-कारवां का लोकार्पण किया गया। पुस्तक में संकलित रचनाओं को संकलित करने का काम नुदरत नवाज ने किया है।

आसान जुबान में गंभीर बातें कहते थे डॉ. राही

सेमिनार में विषय प्रवेश कराते हुए प्रोफेसर डॉ. हसन अब्बास ने कहा कि डॉ. शोएब राही उनके उस्ताद रहे हैं। उन्होंने मीर की शायरी का हवाला देते हुए कहा कि शायर और अफसानानिगार समाज पर पैनी नजर रखते हैं। वे समाज की अच्छाइयों और बुराइयों को अपनी तहरीर में जगह देकर अवाम को सही रास्ता दिखाने का काम करते हैं। डॉ. राही भी इसी परंपरा के शायर थे।
उन्होंने डॉ. राही का एक शेर पढ़ते हुए कहा—

“राही बने हैं हाथ मेहनत के वास्ते,
इसमें कहीं नसीब का लिखा न ढूंढ़िए।”

उन्होंने कहा कि डॉ. राही की खासियत थी कि वे आसान जुबान में गंभीर बातें कह जाते थे।

प्रोफेसर जमील अख्तर ने कहा कि डॉ. शोएब राही उर्दू को महज एक जुबान नहीं, बल्कि तहजीब मानते थे। उन्हें अपने इलाके से गहरा लगाव था। वे मुसलमान होने के साथ-साथ कम्युनिस्ट विचारधारा से भी जुड़े थे। उनका मानना था कि अपनी कलम और गतिविधियों से ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे तहजीब, अपने इलाके और इस्लाम की बदनामी हो। उन्होंने कहा कि डॉ. राही सिर्फ शायर ही नहीं थे, बल्कि मजदूरों के हक के हिमायती भी थे।

इप्टा के राष्ट्रीय सचिव शैलेंद्र कुमार ने कहा कि डॉ. शोएब राही उनके हमसफर भी थे और रहबर भी। उनकी शायरी कौमी यकजहती की मिसाल है। साथ ही, उनकी रचनाएं तरक्कीपसंद तहरीक को नई ऊर्जा प्रदान करती हैं।

सेमिनार के दौरान नसीम रियाजी ने डॉ. शोएब राही की छोटी बहर की गजल “सिर्फ दर्द-ए-सफर देखते रह गए, बस यही उम्र भर देखते रह गए” को तरन्नुम में पेश किया। इशरत बानो ने भी डॉ. राही की गजल का तरन्नुम में पाठ किया।

प्रो. अहमद बद्र को सनद-ए-एज़ाज़

सेमिनार के समापन पर अंजुमन फरोग-ए-उर्दू की पलामू इकाई की ओर से प्रोफेसर अहमद बद्र को उनकी अदबी खिदमात के लिए सनद-ए-एज़ाज़ प्रदान किया गया। डॉ. हसन अब्बास, प्रोफेसर जमील अख्तर, डॉ. मकबूल मंजर, उपेंद्र कुमार मिश्रा और नुदरत नवाज ने संयुक्त रूप से उन्हें सम्मानित किया।

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