रिपोर्टिंग के दौरान छलक पड़े जज़्बात: लछमी मुंडा का दर्द देख दुखी हुए पत्रकार गुलाम शाहिद


रांची। पत्रकारिता का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा को ईमानदारी से सामने लाना भी है। राजधानी रांची के मोरहाबादी क्षेत्र में नगर निगम की कार्रवाई के बाद जब पत्रकार गुलाम शाहिद रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर वे भीतर तक हिल गए।
दसवीं कक्षा की छात्रा लछमी मुंडा स्कूल से लौटी तो पाया कि उसका घर और परिवार की छोटी-सी दुकान मलबे में बदल चुकी है। बारिश में भीगती उसकी किताबें, खुले आसमान के नीचे बैठा परिवार और आंखों से बहते आंसू—यह मंजर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाला था।
गुलाम शाहिद ने बताया कि उस पल वे एक पत्रकार होने के साथ-साथ एक इंसान के रूप में भी भीतर से टूट गए। फिर भी उन्होंने अपने पेशेवर दायित्व का निर्वहन करते हुए इस दर्दनाक दृश्य को कैमरे और कलम के माध्यम से समाज के सामने रखा, ताकि पीड़ित परिवार की आवाज़ जिम्मेदार लोगों तक पहुंच सके।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि विकास और कार्रवाई के बीच मानवीय संवेदनाओं का कितना ध्यान रखा जा रहा है। उन्होंने समाज से अपील की कि लछमी मुंडा की आवाज़ बनें, ताकि उसकी पढ़ाई बाधित न हो, परिवार को राहत मिले और उसके चेहरे की मुस्कान वापस लौट सके।
यह घटना याद दिलाती है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज़ बनने का दायित्व भी है, जिनकी पीड़ा अक्सर भीड़ और व्यवस्था के शोर में दब जाती है।








