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‘याद-ए-रफ़्तगाँ झारखंड’ के दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन, शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों ने उर्दू भाषा और साहित्य की प्रमुख हस्तियों के योगदान को उजागर किया

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रांची, 25 अक्टूबर 2026:गोस्सनर कॉलेज ऑडिटोरियम, रांची में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ‘याद-ए-रफ़्तगाँ झारखंड’ का आज दूसरे और अंतिम दिन शैक्षणिक, साहित्यिक और वैचारिक गतिविधियों के साथ समापन हुआ। सेमिनार में उर्दू भाषा और साहित्य के विकास, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, दिवंगत विद्वानों और साहित्यकारों की सेवाओं को याद करने तथा उनकी यादों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।

‘याद-ए-रफ़्तगाँ झारखंड’ सेमिनार की शुरुआत डॉ. दानिश हम्माद की सुमधुर कुरआन पाठ से हुई। सेमिनार की अध्यक्षता प्रोफेसर सरवर साजिद, उर्दू विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़; डॉ. ज़ैन रामिश, अध्यक्ष, उर्दू विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग; और डॉ. सफदर इमाम कादरी, कॉमर्स कॉलेज, पटना से जुड़े विद्वान ने की।
सेमिनार में डॉ. ज़ैन रामिश ने अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रभावशाली और सरल अंदाज में अपने विचार रखे। उनकी बातों में विषय की गहराई और विचारों की स्पष्टता दिखाई दी। इस अवसर पर सफदर साहब ने भी अपना विस्तृत शोधपत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने सिद्दीक मुजीबी के व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर विस्तार से चर्चा करते हुए उनके साहित्यिक महत्व को सामने रखा।

राजनीतिक नेता जुनैद अनवर ने भी सेमिनार में अपने विचार रखे। उन्होंने अंजुमन फ़रोग़-ए-उर्दू के साहित्यिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों के प्रति अपना समर्थन जताया। उन्होंने आश्वासन दिया कि जब भी संस्था को उनकी किसी प्रकार की सेवा या सहयोग की आवश्यकता होगी, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहेंगे।

मौलाना तहज़ीबुल हसन ने अपने प्रभावशाली भाषण और सरल अंदाज से श्रोताओं का दिल जीत लिया। उन्होंने अंजुमन फ़रोग़-ए-उर्दू के उद्देश्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए उर्दू भाषा और साहित्य के विकास के लिए हर संभव सहयोग देने की बात कही।

इसी अवसर पर जमीयतुल इराक़ीन के सचिव जनाब सैफुल हक़ ने अपने दिवंगत पिता की यादें साझा कीं। उन्होंने उर्दू भाषा और साहित्य से जुड़ी कई यादगार बातें और घटनाएँ सुनाईं। इसके अलावा जनाब नफीस अहमद, सब-रजिस्ट्रार, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, रांची; प्रोफेसर अब्बास; डॉ. परवेज़ शहरयार और प्रोफेसर मुहिबी भी उपस्थित थे।
कार्यक्रम में दिलशाद नज़्मी ने अपनी मधुर आवाज़ और खूबसूरत अंदाज में कविता पाठ किया। उनकी शानदार प्रस्तुति ने महफिल में साहित्यिक रंग भर दिया और श्रोताओं ने इसका आनंद लिया।
इस अवसर पर डॉ. इब्राहीम की पुस्तक ‘उर्दू ज़बान की तासीस और लिसानियात’ का लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक की संपादक डॉ. जिबा हैं, जो रांची विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
दूसरी पुस्तक ‘क़मर जहाँ: हयात और ख़िदमात’*का भी लोकार्पण किया गया। इसकी लेखिका डॉ. शगुफ़्ता परवीन हैं। यह पुस्तक अपने विषय के माध्यम से संबंधित व्यक्तित्व के जीवन और साहित्यिक योगदान के अध्ययन के महत्व को सामने लाती है।
इस अवसर पर त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका अदबी दुनिया, रांची’ का भी लोकार्पण किया गया। साहित्यिक पत्रिकाएँ किसी भी भाषा के रचनात्मक और आलोचनात्मक साहित्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये नए लेखकों को अपनी रचनाएँ प्रकाशित कराने का अवसर देती हैं। साथ ही कहानी, कविता, आलोचना, शोध और साहित्यिक चर्चाओं के माध्यम से भाषा और साहित्य के दायरे को बढ़ाती हैं।

‘अदबी दुनिया, रांची’ का प्रकाशन झारखंड में उर्दू साहित्यिक पत्रकारिता के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। त्रैमासिक पत्रिका के नियमित प्रकाशन से साहित्यिक गतिविधियों को जारी रखने, नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और लेखकों के बीच संपर्क बढ़ाने में मदद मिलेगी।
सेमिनार में कई शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें डॉ. अल्लामा शब्बीर अंसारी, डॉ. अफशां बानो, डॉ. मुहम्मद मुर्शिद, डॉ. अनस हम्माद जाज़िब, मुहम्मद मेहताब आलम, सदर बारून, अनम मुश्ताक, फर्दीन शम्स, अल्ताफ महमूद, मुहम्मद तहसीन, मासूमा परवीन, शहबाज़ अंजुम, आबिदा अंजुम, हिना आफरीन, मुहम्मद सज्जाद हुसैन और रफीक़ आरा सहित अन्य शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले शामिल थे।
शोधपत्रों में साहित्यिक इतिहास, प्रमुख व्यक्तित्वों के योगदान, भाषा और अभिव्यक्ति, शोध एवं आलोचना तथा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। इन प्रस्तुतियों ने उर्दू साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा और नए विचारों की संभावनाओं को सामने रखा।

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का दूसरा और अंतिम दिन विभिन्न शैक्षणिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजकों ने सभी अतिथियों, शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों, शिक्षकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रतिभागियों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
‘याद-ए-रफ़्तगाँ झारखंड’ सेमिनार का संचालन डॉ. कफील अहमद कैफ़ी ने कुशल और प्रभावशाली अंदाज में किया। अंत में डॉ. शहनवाज़ खान ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसके बाद सेमिनार का समापन हुआ।
कार्यक्रम के अंत में सभी शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों को उनकी शैक्षणिक और साहित्यिक सेवाओं के सम्मान तथा प्रोत्साहन के लिए प्रमाणपत्र और स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया गया। सेमिनार में शहर की कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक, साहित्यिक और सामाजिक हस्तियों के साथ बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया। उनकी उपस्थिति और सहभागिता ने इस साहित्यिक आयोजन को यादगार बना दिया।

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