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तालीम के साथ-साथ तरबियत और डिसिप्लिन पर खास ध्यान देना वक्त की जरूरत: अधिवक्ता परवेज आलम

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मदरसे के जिम्मेदार दीनी साथियों। मदरसों में तालीम, तरबियत और डिसिप्लिन के बारे में एक पैगाम ,मदरसों का असल मकसद सिर्फ किताबी इल्म देना नहीं, बल्कि बच्चों की बेहतर शख्सियत (Personality) बनाना भी है। इसलिए तालीम के साथ-साथ तरबियत और डिसिप्लिन पर खास ध्यान देना वक्त की जरूरत है। तालीम (शिक्षा):
इल्म ऐसा हो जो दीन के साथ दुनिया की समझ भी दे। बच्चों को कुरआन, हदीस के साथ-साथ अच्छी अख़लाकी बातें और समाज में रहने का सलीका भी सिखाया जाए।तरबियत (संस्कार):अदब, एहतराम, सच्चाई, सब्र और इंसानियत—ये वो गुण हैं जो एक अच्छे इंसान की पहचान बनाते हैं। उस्ताद और मौलवी हजरात खुद अपने किरदार से बच्चों के लिए मिसाल बनें। डिसिप्लिन (अनुशासन):वक्त की पाबंदी, जिम्मेदारी और नियमों का पालन—ये आदतें बच्चों को जिंदगी में कामयाब बनाती हैं। सख्ती नहीं, बल्कि मोहब्बत और समझदारी से अनुशासन कायम किया जाए। पैगाम:”मदरसों की कामयाबी सिर्फ आलिम बनाने में नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार और अच्छे इंसान तैयार करने में है जो समाज में अमन, मोहब्बत और भाईचारा फैलाएं।”लेखक अधिवक्ता परवेज आलम।

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