Tuesday, May 28, 2024
Blog

रोजे के जिस्मानी व रूहानी फायदे: मो० युसुफ अंसारी

मजहब ईस्लाम का हर आदेश किसी न किसी हिकमत व फलसफे पर आधारित होता है लेहाजा जहाँ पर इस्लाम ने अपने अनुयायों पर बहूत से अनिवार्यता को लागू किया है वहीं पर उनकी शारीरिक व अध्यातमिक इलाज के लिए रोजे की फरजियत का हुकम सुनाए, जब एक रोजेदार अपने रब के हुकम से हलाल चिजों के उपयोग से रूक जाता है तो फिर यह हमेशा के लिए हराम करदह चिजों के करीब भी कैसे फटक सकता है। एक मुस्लमान जब रमजान के महीने में भूखा प्यासा रह कर अपने खालीक के आदेशों का पालन करने के लिए हमेशा कमरबस्ता व मुस्तैद रहता है यही अभ्यास और ट्रेनिंग की वजह से इश्वर अल्लाह अपने बनदे के दिलों में तकवा यानी परहेजगारी जैसा विशेषता उत्पन्न कर देता है।

इंसान के इस अमल के तरज पर जब घोडों के सवारी का आम रिवाज था उस वक्त अहलेअरब अपने घोडों को मेहनती और फुर्तीले बनाने के लिए अकसर भुखे प्यासे रखते थे जिस की वजह से भूख प्यास की शिद्दत व तकालीफ (कष्ट) को झेलने और बरदास्त करने के आदी हो जाते थे. चुनांचे अहलेअरब ऐसे घोडों को (फंसे शायम) रोजेदार घोडे कहते थे, जिस तरह घोडे के गेजा (खुराक) को कम कर के उसे घोडे दौड और युद्ध के लिए तैयार किया जाता था उसी तरह रोजा भी मोमीनों को राहे जुलजलाल (इश्वर के राह) में पूरअजम व तेजगाम और जफाकस बनाने के लिए फर्ज कीया गया, इस तरह से रोजे से जिसमानी फायदे हासिल किये जा कसते हैं. रोजह नफस की सरकशी को तोडने के नेहायत ही मोवस्सिर (कारगर) हथ्यार है. आम तौर पर इनसान नफसानी ख्याहिसात का असीर (गूलाम) हो कर दील में उभरनेवाले बुराईयों के दलदल में फंस जाता है, चुनांचे रोजह एक ऐसी इबादत है जो के नफस की बढ़ती सरकशी को लगाम देता है और हैवानी ख्वाहिसात को बेकाबु नहीं होने देता, यही वजह है के रसूलेअकरम स० ने नवजवानों की जमाअत (गिरोह) को सम्बोधित करते हुए कहा कि अए नौजवानों की जमाअत तुम में से जो कोई सख्स शादी की ताकत रखता वो शादी करले इस वजह से की ये निगाहों की और शरमगाहों की हिफाजत का जरिया है, और जो कोई इंसान इसकी ताकत नहीं रखता तो उसे चाहिए की वो रोजा रखे, रोजह नफसानी ख्वाहिश के जोर को तोडता है सही बुखारी 5065 मुस्लिम 1400,

रोजे के विभन्न तिब्बी (रोगों का उपचार) फयायेद भी हासिल होते हैं. अल्लाह तबारक व ताला का अपने बनदों पर बहुत सारे इनामात व एहसानात है अल्लाह ताला का एक बडा फजल व करम ये है कि उसने हमारे जिन इबादतों को उम्मत के लिए लाजमी करार दिया है वह इंसानी सेहत व तंदूरुस्ती के लिए टॉनिक और मकवी दवा की हैसियत रखते हैं और ये इबादतें इंसानी शरीर के विभन्न बीमारीयों के खातमे का नेहायत हि अचुक माध्यम है खूद डॉकटरों व वैदधों ने इसके भिन्न तिब्बी फयेदे बताये है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के माहिर डॉ० जोजफ और आधुनिक वबाई बिमारी के शोधकरता ने ये साबित कीया है कि रोजे की वजह से आदमी गुरदे की बीमारी पैरों में होने वाले सुजन, और जोडों के पुराने दरदों से महफुज रखता है, इसके एलावा रोजह दिल की बीमारीयों, मोटापे और रक्तचाप में भी हद दरजा मुफिद है.

तमाम उम्मते मुस्लमों को चाहिए की इस अफजल महीने से फायदा उठाते हुए उन तमाम तरह के स्प्रीट की आदी बन जाएँ के गैरे रमजान में भी हमारे अन्दर वही स्प्रीट कायम व दायम रहें।

(मो० युसुफ अंसारी)

Leave a Response