एडवोकेट मोहम्मद परवेज आलम की कलम से, “जकात का इस्लामिक पैगाम”


एडवोकेट मोहम्मद परवेज आलम की कलम से, “जकात का इस्लामिक पैगाम” बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम, इस्लाम में ज़कात एक बहुत बड़ा इबादत और फ़र्ज़ है। ज़कात सिर्फ माल देने का नाम नहीं बल्कि दिल को पाक करने और समाज के गरीबों की मदद करने का जरिया है। जो मुसलमान अल्लाह ने माल और दौलत से नवाज़ा है, उस पर ज़कात देना अनिवार्य है।ज़कात देने से माल में कमी नहीं होती बल्कि अल्लाह उसमें बरकत अता फरमाता है और देने वाले को दुनिया और आख़िरत में कामयाबी देता है। ज़कात गरीबों का हक़ है और इसे खुशी और ईमानदारी से अदा करना चाहिए। जकात उन्हें दें जैसे गरीब (फकीर), मिशकिन (अत्यधिक जरूरतमंद), जकात इक्ट्ठा करने वाले, कर्जदार ,मुसाफिर (जरूरतमंद यात्री) अल्लाह की राह में यानी ऐसे लोग जो दिन की खिदमत में लगे हों, और न्यू मुस्लिम यानी ईमान लाने वाले को, इस्लाम में जकात बहुत ऊंचा और फर्ज /अनिवार्य मकाम रखती है और इस्लाम के पांच बुनियादी चीजों में से एक है l अल्लाह हम सबको सही तरीके से ज़कात अदा करने और गरीबों की मदद करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
आमीन।








