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वक्फ संशोधन कानून 2024 को अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की आवाज़ को रौंदते हुए भाजपा सरकार ने अपने दोनों सदन से पास करवा लिया। सिर्फ राष्ट्रपति की सहमति बाकि है

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वक्फ संशोधन कानून 2024 को अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की आवाज़ को रौंदते हुए भाजपा सरकार ने अपने दोनों सदन से पास करवा लिया। सिर्फ राष्ट्रपति की सहमति बाकि है।

वक्फ (संशोधन) बिल, 2024 का मकसद वक्फ अधिनियम, 1995 में छेड़ छाड़ कार मुस्लिमों की सम्पत्ति को हड़पना है, सरकार का कहना है कि वो इसे गरीब मुसलामनों के लिए लाई है।
इसका समर्थन करने वाले दावा कर रहे हैं कि इससे मुसलमानों को बहुत फायदा होगा। माफिया राज खत्म हो जाएगा। गोदी मीडिया भी यही कह रही है।
लेकिन यह महज़ छलावा है। नए वक्फ कानून से भी किसी गरीब मुस्लिम का कोई फायदा नहीं होने वाला है। मुसलमान लगातार उक्त संशोधित बिल का विरोध कर रहे हैं।

2025 में बिहार चुनाव, फिर बंगाल चुनाव 2026 और 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस कानून को लाया जा रहा है। इन तीनों राज्यों में मुस्लिमों की घनी आबादी है। वहां उनके वोट चुनावी राजनीति को बाकायदा प्रभावित करते हैं। इस कानून की आड़ में तीनों राज्यों में वोट का खेल होगा। डंडा चलेगा। डराया जाएगा।

प्रस्तावित वक्फ कानून से बहुत भारी तबाही मचने वाली है। जिस मस्जिद, जिस दरगाह, जिस इमामबाड़े पर सरकार ने हाथ रख दिया या उसके डीएम/डीसी/जिलाधिकारी ने बता दिया कि यह सरकारी जमीन है, वक्फ नहीं है तो मामला खत्म हो जाएगा। आप अदालतों में लड़ाई लड़ते रहिए। सरकार के तर्क बेमानी हैं। यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26 का खुला उल्लंघन है।

सरकार ने जो बिल पेश किया और गरीब मुस्लिमों की जो दुहाई दी वो छलावा है। संसद में की गई जुमलेबाजी और वक्फ बिल की हकीकत में जमीन आसमान का फर्क है।

भारतीय न्यायपालिका की अभी जो स्थिति है वो बताने की जरूरत नहीं है कि कई जज भी अब भ्रष्ट हो चुके हैं। आदर्शवादी बातें छाटने वाला मुख्य जज रिटायर होने के बाद सांसद बन जाता है, दूसरा मंदिर की घंटी बजाते नजर आता है।

चीन हमारे देश की हजारों हेक्टेयर जमीन कब्जा कर ली और सरकार खामोश है, लेकिन कमज़ोर मुसलमानों की ज़मीन को ज़बरन मुसलमानों से हड़पने की कोशिश कर रही है। यह कैसा संशोधित बिल है कि जो मुस्लिम समुदाय के इच्छाओं के खिलाफ लाया जा रहा है।

सैयद शीश आलम
अधिवक्ता
सिविल कोर्ट रांची।
प्रेसीडेंट
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) रांची।

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