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एडवोकेट मोहम्मद परवेज आलम की कलम से।इस्लाम में वसीयत (WILL) – एक पैगाम

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इस्लाम एक मुकम्मल और इंसाफ़ वाला निज़ाम है। इसमें इंसान की ज़िंदगी के साथ-साथ उसके इंतिक़ाल (मौत) के बाद के मामलों को भी साफ़ तौर पर बयान किया गया है। उन्हीं अहम मसाइल में से एक है वसीयत। वसीयत का मतलब: वसीयत वह हिदायत है जो कोई मुसलमान अपनी मौत से पहले अपनी माल-दौलत या किसी नेक काम के बारे में लिखकर या गवाहों के सामने बयान करता है, ताकि उसके बाद उस पर अमल किया जा सके।
वसीयत करने का समय,इस्लाम की तालीम यह है कि अगर किसी इंसान के पास माल है या कोई जिम्मेदारी है, तो उसे चाहिए कि वह अपनी वसीयत तैयार रखे। हदीस में आता है कि मुसलमान को दो रात भी बिना वसीयत लिखे नहीं गुजारनी चाहिए, अगर उसके पास वसीयत करने लायक कोई चीज़ हो।
वसीयत किसको की जा सकती है?
वसीयत आम तौर पर गैर-वारिस (जो शरीअत के हिसाब से वारिस नहीं है) को की जाती है।
जैसे: गरीब रिश्तेदार, यतीम, जरूरतमंद लोग या किसी खैराती काम (मस्जिद, मदरसा, समाजी काम) के लिए। वसीयत किसको नहीं की जा सकती है-
किसी वारिस (जैसे बेटा, बेटी, बीवी, माता-पिता) के लिए वसीयत करना आम तौर पर जायज़ नहीं, क्योंकि उनका हिस्सा पहले से ही शरीअत में तय है।
वसीयत कितनी की जा सकती है?
इस्लाम में वसीयत की सीमा भी तय है:कुल माल का एक तिहाई (1/3) तक ही वसीयत की जा सकती है।
बाकी माल शरीअत के मुताबिक वारिसों में तकसीम होगा। वसीयतकर्ता के इंतकाल के बाद वसीयत लागू होगा
समाज के लिए पैगाम:
मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने माल और जिम्मेदारियों के बारे में साफ़ वसीयत लिखें, ताकि उनके बाद परिवार में झगड़ा और नाइंसाफी न हो। इस्लाम इंसाफ, अमानत और रिश्तों की हिफाज़त की तालीम देता है, इसलिए वसीयत को भी उसी उसूल के साथ करना चाहिए। वाज़े रहे कि मुस्लिम वसीयत का रजिस्टर्ड होना कानूनी रूप से जरूरी नहीं है, और ना ही अदालत �

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