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डेटा-उपनिवेशवाद के विरुद्ध रांची से ‘डिजिटल शंखनाद’: बिग-टेक के एकाधिकार को ज़क्टर (ZKTOR) की सीधी चुनौती

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प्राइवेसी, सेटिंग नहीं, सिस्टम का हिस्साः बिना विदेशी फंडिंग के तैयार हुआ भारतीय सुपर-ऐप ज़क्टर, जीरो नॉलेज आर्किटेक्चर और नो-यूआरएल तकनीक से सुरक्षित होगी महिलाओं की गरिमा, क्रिएटर्स को मिलेगा 70% सीधा मुनाफा ।

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रांची: आज रांची प्रेस क्लब में सीईओ सुनील कुमार सिंह,
सीएफओ अंशु प्रिया, सोमनाथ आर्या ने संयुक्त रूप से प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि आज सोशल मीडिया समाज के हर आयु वर्ग, मेट्रो से लेकर गाँव देहात तक रोजाना इस्तेमाल करता है, सभी सोशल मीडिया ऐप्स हमारा बिहेवियर ट्रैक करते हैं, हमारे द्वारा अपलोड किये गए फोटो वीडियो तो कोई भी आसानी से डाउनलोड कर सकता है, और अब एआई के युग में उन्हें मॉडिफाई कर आसानी से मिसयूज भी किया जा सकता है, यह अब सभी विदेशी ऐप्स की जमी जमाई व्यवस्था बन चुकी है। इसी स्थापित व्यवस्था के बीच रांची से जुड़ा भारतीय प्लेटफॉर्म जक्टर (ZKTOR) एक अलग दिशा का संकेत दे रहा है, ऐसी दिशा, जहाँ प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को किसी पॉलिसी या सेटिंग से नहीं, बल्कि सिस्टम के डिज़ाइन में ही सम्मिलित कर दिया गया है।

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जक्टर (ZKTOR) एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है जो यूजर्स की प्राइवेसी, डेटा सेफ्टी और डिजिटल डिग्निटी को असाधारण गंभीरता के साथ सिस्टम डिज़ाइन के स्तर पर प्राथमिकता देता है। जैसे कि जक्टर में अपलोडेड वीडियो का यूआरएल न होना जिससे बीडियो बाहर से डाउनलोड या मिसयूज किया ही न जा सके, महिलाओं की डिजिटल डिग्निटी के मुद्दे को चर्चा का विषय तो बनाता ही है, साथ ही यह कड़ा सवाल उठाता है कि आखिर वैश्विक प्लेटफॉर्म्स ऐसी स्ट्रक्चरल सेफ्टी को प्राथमिकता देने में अब तक क्यों पीछे रहे, क्या यह उनके बिज़नेस मॉडल और टेक प्रायोरिटीज़ का नतीजा था या फिर पुरानी टेक्नोलॉजी की सिस्टम लेवल लिमिटेशंस की वजह।

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जक्टर (ZKTOR) एक ऑल इन वन भारतीय सुपर ऐप है। इसमें सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, लॉन्ग वीडियो प्लेटफॉर्म और फुली एन्क्रिप्टेड मैसेंजर शामिल है। मतलब अलग-अलग ऐप्स के बजाय सभी तरह की सुविधा एक ही ऐप में मिलती है। जक्टर की पहचान प्राइवेसी बाय डिज़ाइन से है। इसके ऐप और सर्वर की संरचना ही ऐसी बनाई गई है कि यूज़र का निजी डेटा, संदेश, फोटो या वीडियो पूर्ण रूप से एन्क्रिप्टेड फॉर्म में सेव होता है और खुद प्लेटफॉर्म के लिए भी यूज़र के डेटा तक पहुंच तकनीकी रूप से संभव नहीं रहती। इसी को जीरो नॉलेज आर्किटेक्चर कहा जाता है। यानी भरोसा किसी पॉलिसी पर नहीं, बल्कि तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर आधारित होता है। मौजूदा वैश्विक सोशल मीडिया मॉडल में जहाँ प्रोफाइलिंग और डेटा कलेक्शन ही कमाई का आधार है, वहीं जक्टर को पूरी तरह इस व्यवस्था के विपरीत डिजाइन किया गया है।

यह जीरो बिहेवियर ट्रैकिंग का ढांचा सामने रखता है और एक बड़ा सवाल उठाता है कि क्या अब एआई के युग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे ही जीरो नॉलेज और सीमित डेटा-आधारित सिस्टम की ओर बढ़ना चाहिए ताकि डीपीडीपी (DPDP) और जीडीपीआर (GDPR) जैसे कानूनों की भावना तकनीकी आर्किटेक्चर में ही सम्मिलित हो सके

जक्टर (ZKTOR) के डिज़ाइन में नो-यूआरएल कंटेंट स्ट्रक्चर है जहाँ अपलोडेड फोटो और वीडियो का बाहरी शेयरिंग पाथ सीमित है जो कंटेंट को प्लेटफॉर्म के बाहर ले जाने कॉपी डाउनलोड री-अपलोड या एआई के जरिए मॉडिफाई कर दुरुपयोग से मजबूतं सुरक्षा देता है।

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