मत्स्य निदेशालय के सेवानिवृत निदेशक डॉ. एचएन द्विवेदी की कार्यशैली अनुकरणीय, आठ वर्षों में मत्स्य उत्पादन हुआ दोगुना


प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के सफल कार्यान्वयन से मत्स्य कृषकों की बढ़ी आर्थिक समृद्धि
रांची। झारखंड के मत्स्य निदेशालय के अधिकारियों के मुताबिक सूबे के मत्स्य पालकों/कृषकों की दशा और दिशा सुधारने के लिए विभाग निरंतर प्रयासरत है। राज्य में मछली का उत्पादन बढ़ाने और मत्स्य पालकों की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि के लिए मत्स्य निदेशालय विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने में सफल हो रहा है।
विगत तकरीबन आठ वर्षों में झारखंड में मछली उत्पादन में दोगुना वृद्धि हुई है। मत्स्य निदेशालय के निदेशक डाॅ. एचएन द्विवेदी (अब सेवानिवृत) ने अपने आठ वर्षो के कार्यकाल में झारखंड में मत्स्य पालन एवं उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। मछली के उत्पादन में डाॅ. द्विवेदी ने राज्य को आत्मनिर्भरता के मुकाम पर पहुंचाने में सफलता पाई है। उनके कार्यकाल में विभागीय उपलब्धियां मील का पत्थर साबित हुई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2016-17 में मछली का उत्पादन एक लाख 45 हजार मीट्रिक टन था, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर तीन लाख 63 हजार मीट्रिक टन हो गया। राज्य गठन के समय वर्ष 2001-02 में मछली उत्पादन मात्र 14 हजार मीट्रिक टन था। राज्य गठन के बाद सूबे में मछली की खपत भी बढ़ी। राज्य का प्रति कैपिटा प्रति वर्ष प्रति केजी मछली की खपत वर्ष 2024-25 में 14.13 केजी हो गया।
राज्य में केज कल्चर तकनीक शुरू किया गया। यहां के केज कल्चर तकनीक का अध्ययन दूसरे राज्यों के मत्स्य किसान करते हैं। डाॅ.द्विवेदी के कार्यकाल में मछली पालन के लिए कई नई तकनीकें अपनाई गई। पूर्व की तुलना में दोगुना केज हाउस लगाये गये। वहीं, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत नर्सरी तालाबों का निर्माण कराया गया।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना अंतर्गत लाभुकों को हेचरी अधिष्ठापन, नए रियरिंग तालाब के निर्माण, बायोफ्लाक्स तालाब निर्माण, मध्यम आकार के सजावटी रंगीन अलंकारी मछलियों की रियरिंग आदि के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति एवं एवं महिला लाभुक को अनुदान दिया गया।
केज कल्चर में झारखंड देश का अग्रणी राज्य है।
प्रति केज औसतन तीन से चार टन मछली का उत्पादन वर्तमान समय में हो रहा है। मछली फीड के उत्पादन के लिए विभिन्न जिलों में फीड मिल स्थापित किया गया। इस संबंध में डॉ. द्विवेदी ने बताया कि तालाबों को सघन मत्स्य पालन से जोड़ने के लिए पांच हजार मत्स्य बीज प्रति एकड़ संचयन करते हुए प्रति एकड़ 1875 का अनुदान उपलब्ध कराया गया। इससे मत्स्य कृषकों की आय में वृद्धि हुई।
मत्स्य कृषकों के निजी तालाबों में झींगा पालन एवं देसी मांगुर पालन शुरू किया गया।
इससे कई किसान आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो रहे हैं।
उन्होंने बताया कि अनुसूचित जनजातियों का आर्थिक रूप से मजबूत करने के उद्देश्य से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में गुमला, सिम देगा, हजारीबाग जिला में सेंट्रल आइलैंड फिसरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, कोलकाता के माध्यम से झींगा पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत अनुसूचित जनजातियों को मछली पालन की विभिन्न योजनाओं का आधिकारिक लाभ मिल रहा है।
राज्य स्तर पर मछली पालन, बीज उत्पादन हेचरी संचालन केज में मछली पालन, सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम, बायो फ्लॉक टैंक एवं बायोफ्लॉक्ड तालाब में मछली पालन, मोती पालन, झींगा पालन, रंगीन मछली पालन, फिश फीड आदि पर आवासीय प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
प्रशिक्षण का दायरा बढ़ाते हुए वर्ष 2024-25 में 142005 कृषकों को प्रशिक्षित किया गया। मछुआरों के बीमा कवरेज के रूप में अब तक 18 से 70 वर्ष के आयु वर्ग के 173900 सक्रिय मछुआरों को आच्छादित किया गया। सक्रिय मछुआरों की दुर्घटना में मृत्यु अथवा पूर्ण अस्थाई अपंगता की स्थिति में पांच लाख, आंशिक अस्थाई अपंगता की स्थिति में ढाई लाख, हॉस्पिटैलिटी की स्थिति में उनके आश्रित को 25 हजार का भुगतान बीमा का प्रावधान है। दुर्घटना की स्थिति में अब तक 45 बीमा दावा का भुगतान किया गया है।
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*मत्स्य कृषकों को क्रेडिट कार्ड से किया गया आच्छादित
मत्स्य कृषक योजना के क्रियान्वयन के लिए मत्स्य कृषकों को किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। अब तक 1789 कृषकों को किसान क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराया गया है। वर्तमान में राज्य में कुल 907 मत्स्यजीवी सहयोग समितियां हैं।
विभागीय अधिकारियों के मुताबिक मछली उत्पादन में वृद्धि के लिए मत्स्य निदेशालय, (झारखंड सरकार) निरंतर प्रयासरत है।
यदि इसी प्रकार मत्स्य निदेशालय की योजनाएं गतिशील रही तो वह दिन दूर नहीं, जब झारखंड मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाएगा।








